अब मानवता का चश्मा उतारने का समय आ गया है – आतंकवाद का असली चेहरा और उसका एकमात्र समाधान
❖ भूमिका: जब आँसू भी लाचार हो जाते हैं हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ शब्द "मानवता", "शांति", और "अहिंसा" केवल भाषणों तक सीमित रह गए हैं। हर बार जब कोई आतंकी हमला होता है, हम मोमबत्तियाँ जलाते हैं, नारे लगाते हैं, और दो दिन बाद सब कुछ भूल जाते हैं। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि जो मरे वो लौटकर नहीं आएंगे? उनके लिए ये नारे, ये सांत्वना... क्या ये काफी हैं? जब कोई आतंकी किसी होटल, मंदिर, या ट्रेन में बम फोड़ता है, तो वो केवल एक इमारत या इंसान को नहीं मारता, वो पूरी मानवता को लहूलुहान कर देता है। और तब सवाल उठता है – आखिर कब तक? ❖ "आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता" – एक अधूरी सच्चाई यह वाक्य हम सबने कई बार सुना है। और आदर्श रूप से यह बिल्कुल सही होना चाहिए। लेकिन जब हम वैश्विक आतंकवादी घटनाओं के आँकड़े देखते हैं, तो एक सच्चाई सामने आती है जिसे हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। क्यों 90% से अधिक आतंकवादी घटनाएँ एक ही विशेष धार्मिक विचारधारा से जुड़ी होती हैं? क्या यह महज संयोग है? या फिर इसके पीछे एक संगठित प्रचार, प्रशिक्षण, और राजनीतिक समर्थन है? ह...