अब मानवता का चश्मा उतारने का समय आ गया है – आतंकवाद का असली चेहरा और उसका एकमात्र समाधान
❖ भूमिका: जब आँसू भी लाचार हो जाते हैं
हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ शब्द "मानवता", "शांति", और "अहिंसा" केवल भाषणों तक सीमित रह गए हैं। हर बार जब कोई आतंकी हमला होता है, हम मोमबत्तियाँ जलाते हैं, नारे लगाते हैं, और दो दिन बाद सब कुछ भूल जाते हैं। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि जो मरे वो लौटकर नहीं आएंगे? उनके लिए ये नारे, ये सांत्वना... क्या ये काफी हैं?
जब कोई आतंकी किसी होटल, मंदिर, या ट्रेन में बम फोड़ता है, तो वो केवल एक इमारत या इंसान को नहीं मारता, वो पूरी मानवता को लहूलुहान कर देता है। और तब सवाल उठता है – आखिर कब तक?
हर बार जब कोई देश विशेष समुदाय के आतंकियों को मारता है, तो अचानक मानवता का चश्मा पहन लिया जाता है। लेकिन जब वही आतंकी मासूमों को मारते हैं – तब कोई धर्म, कोई मानवाधिकार संगठनों की आवाज़ नहीं उठती।
❖ सहानुभूति के नाम पर चुप्पी – क्या यह भी अपराध नहीं है?
जब कोई देश आतंकवादियों को पनाह देता है, उन्हें "गुड टेररिस्ट" और "बैड टेररिस्ट" में बाँटता है, और वहाँ की जनता कभी उसके खिलाफ नहीं बोलती – तो क्या वे भी अप्रत्यक्ष रूप से आतंकवाद के समर्थक नहीं हो जाते?
यदि पाकिस्तान की सरकार और वहाँ की जनता बार-बार भारत विरोधी आतंकियों का साथ देती है, और खुलेआम जश्न मनाती है जब भारतीय जवान मरते हैं – तो क्या हम अब भी वहाँ के आम नागरिकों को "मासूम" कह सकते हैं?
❖ अब वक्त आ गया है – जब हम भी इज़राइल की तरह सोचें
भारत को भी अब यह मानसिकता अपनानी होगी। सेना को न केवल "फ्री हैंड" देना होगा, बल्कि यह भी निर्देश देना होगा कि:
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आतंकवादियों के साथ-साथ उन्हें पनाह देने वालों को भी समाप्त किया जाए।
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यदि दुश्मन देश की जनता आतंकियों के साथ खड़ी हो, तो उन्हें भी उत्तर दिया जाए।
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सीमाओं के पार हमला केवल प्रतीकात्मक न हो, निर्णायक हो।
❖ हाल के आतंकी हमलों से सबक
भारत में हाल ही में हुए हमले – जिसमें हिंदू पर्यटकों को निशाना बनाया गया – यह केवल एक देश पर नहीं, एक धर्म, एक संस्कृति, और एक पहचान पर हमला था।
❖ निष्कर्ष: अब चुप रहना देशद्रोह के समान है
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